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सरकारी अस्पतालों का 'डेथ ट्रैप': डेंटिस्ट की एक कटोरी और मुफ्त में बंटता मौत का संक्रमण!

क्या आप दांत के दर्द से राहत पाने के लिए सरकारी अस्पताल जाने की सोच रहे हैं? अगर हाँ, तो थोड़ा ठहरिए! वहाँ राहत मिले न मिले, लेकिन एक ऐसी जानलेवा बीमारी मुफ्त में मिल सकती है जिसका इलाज जिंदगी भर नहीं होता। ​आज हम दंत चिकित्सा (Dentistry) के उस कड़वे और डरावने सच का पर्दाफाश करने जा रहे हैं, जिसे अमूमन सरकारी अस्पतालों में 'भीड़' और 'रिफॉर्म' के नाम पर दबा दिया जाता है। यह सच है— 'कटोरी वाले शॉर्टकट' का खूनी खेल! ​आँखों देखी सच्चाई: एक ही कटोरी, एक ही घोल और सैकड़ों मरीज ​सरकारी अस्पतालों के डेंटल ओपीडी (OPD) के बाहर मरीजों की लंबी कतारें होती हैं। लेकिन अंदर का नजारा और भी खौफनाक होता है। डॉक्टर या उनके असिस्टेंट के पास स्टील की एक कटोरी होती है, जिसमें कोई एंटीसेप्टिक लिक्विड (जैसे डेटॉल या सैवलॉन) भरा होता है। ​ पहला मरीज आता है: उसके मुंह में औजार डालकर जांच की जाती है, खून और लार से सने उस औजार को उसी कटोरी के घोल में डुबोया जाता है। ​ दूसरा मरीज तुरंत बैठता है: असिस्टेंट उसी कटोरी से गीला औजार निकालता है, हल्के से पोंछता है और दूसरे मरीज के मुंह मे...

वीआईपी (VIP) दौरा: लोकतंत्र का उत्सव या आम जनता की जेब पर भारी खर्च?

जब भी देश के प्रधानमंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री का किसी जिले या क्षेत्र में दौरा होता है, तो पूरा प्रशासनिक अमला अलर्ट मोड पर आ जाता है। सड़कों की मरम्मत रातों-रात हो जाती है, सुरक्षा के अभेद्य इंतजाम किए जाते हैं, और एक बड़ा सा तामझाम दिखाई देता है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक बड़ा सवाल हमेशा तैरता रहता है— इस पूरे दौरे में कितना पैसा खर्च होता है और यह पैसा किसकी जेब से जाता है? ​आइए इस पूरे तंत्र, इसके पीछे होने वाले खर्च और इसके बजटीय गणित को विस्तार से समझते हैं। ​1. वीआईपी दौरे में कहाँ-कहाँ खर्च होता है? (खर्च के मुख्य घटक) ​एक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के दौरे को सफल बनाने के लिए कई विभागों को एक साथ मिलकर काम करना पड़ता है। इसमें होने वाले खर्चों को मुख्य रूप से इन श्रेणियों में बांटा जा सकता है: ​ सुरक्षा व्यवस्था (Security): यह सबसे बड़ा और सबसे खर्चीला हिस्सा होता है। प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी SPG (Special Protection Group) के पास होती है, जबकि मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा में स्टेट पुलिस, एंटी-टेरर स्क्वाड (ATS) और केंद्रीय बल तैनात होते हैं। दौरे ...

कागजी जंगल और रिकॉर्ड तोड़ दावे: हर साल रोपे जाने वाले लाखों-करोड़ पौधे आखिर जाते कहां हैं?

जून-जुलाई का महीना आते ही उत्तर प्रदेश में एक उत्सव बहुत जोर-शोर से शुरू होता है—"वृक्षारोपण महाअभियान"। हर साल दावा किया जाता है कि प्रदेश में एक ही दिन में 25 करोड़, 30 करोड़ या 35 करोड़ पौधे लगा दिए गए। बकायदा इसके लिए सरकारी मशीनरी झोंक दी जाती है, मंत्रियों से लेकर अफसरों तक हाथ में खुरपी और नन्हा सा पौधा थामे कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं। शाम तक प्रेस नोट जारी होता है कि एक नया रिकॉर्ड बन गया है। ​लेकिन जैसे ही मॉनसून बीतता है और सर्दियां आती हैं, वे 'रिकॉर्ड तोड़' पौधे गायब हो जाते हैं। अगले साल उसी जगह पर फिर से नया गड्ढा खोदा जाता है और फिर से एक नया रिकॉर्ड दर्ज कर दिया जाता है। सवाल उठता है कि अगर पिछले 5-10 सालों के आंकड़ों को जोड़ दिया जाए, तो उत्तर प्रदेश को अब तक दुनिया का सबसे घना वन क्षेत्र बन जाना चाहिए था। तो फिर हर साल बढ़ती यह जानलेवा गर्मी, सूखते जलस्रोत और कंक्रीट के तपते शहर गवाही क्यों दे रहे हैं कि जमीन पर कुछ नहीं बदला? ​सरकारी गणित बनाम जमीनी हकीकत: आंकड़ों का मायाजाल ​अगर हम सरकारी आंकड़ों की बात करें, तो उत्तर प्रदेश...

मुख्य बाजारों में जाम का टॉर्चर: जब दुकानदार मस्त और जनता पसीने में पस्त, आखिर कब जागेगा प्रशासन?

हम चाहे देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक सदर बाजार और चावड़ी बाजार में खड़े हों, या फिर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के ऐतिहासिक चौक इलाके में—एक नजारा हर जगह एक जैसा मिलता है। वह नजारा है—सड़क के नाम पर बची महज एक पतली सी गली, रेंगते हुए वाहन, हॉर्न का कान फाड़ता शोर और चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ, जाम में फंसी बेबस जनता। ​सड़कें गाड़ियों के चलने और पैदल यात्रियों के सुरक्षित आवागमन के लिए बनाई जाती हैं। लेकिन हमारे देश के मुख्य बाजारों (Main Markets) की सूरत देखकर ऐसा लगता है जैसे सड़कों का मकसद ही बदल दिया गया है। सवाल यह उठता है कि जिस सड़क को खाली और साफ होना चाहिए, वह अतिक्रमण और अव्यवस्था का अड्डा क्यों बन चुकी है? और सबसे बड़ा सवाल—जब जनता इस नरक को झेल रही होती है, तब जिम्मेदार महकमे क्या कर रहे होते हैं? ​दुकानदार मस्त, जनता धूप में त्रस्त! ​किसी भी बड़े बाजार में चले जाइए, अधिकांश दुकानदार अपनी दुकानों के शटर से दो से तीन फीट बाहर तक सामान फैलाकर बैठते हैं। कुछ का बस चले तो वे आधी सड़क ही अपनी दुकान में शामिल कर लें। इसके बाद बची-कुची सड़क पर रेहड़ी-पटरी और ठेले वाले ...

नगर निगमों का ABC प्रोग्राम: जनता के पैसे की बर्बादी या सिर्फ टेंडर कंपनियों का 'स्कैम' ?

​सड़कों पर घूमते आवारा कुत्ते, आए दिन बच्चों और बुजुर्गों पर होते हमले और हर कोने से आती रेबीज के खतरे की खबरें—यह आज देश के लगभग हर शहर की कड़वी सच्चाई है। इस समस्या से निपटने के लिए नगर निगमों द्वारा ABC (Animal Birth Control) कार्यक्रम यानी कुत्तों की नसबंदी का अभियान चलाया जाता है। कागजों पर तो यह योजना बेहतरीन दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह कार्यक्रम सिर्फ "जनता के पैसे की बर्बादी" और "टेंडर लेने वाली कंपनियों के फायदे" का जरिया बनकर रह गया है। ​अगर समय रहते इस व्यवस्था को नहीं सुधारा गया, तो यह सरकारी बजट को डकारने वाला एक बड़ा सफेद हाथी साबित होगा। ​गणित सीधा है: कछुए की रफ्तार से नहीं थमेगी कुत्तों की आबादी ​आइए एक सीधा और व्यावहारिक गणित समझते हैं। एक मादा कुत्ता साल में दो बार बच्चे दे सकती है और एक बार में औसतन 4 से 6 बच्चों को जन्म देती है। इस रफ्तार से शहर में हर साल लाखों नए पिल्ले पैदा हो रहे हैं। ​दूसरी तरफ, हमारे नगर निगम और उनकी टेंडर पाने वाली एजेंसियां साल भर में बमुश्किल 4-5 हजार कुत्तों की सर्जरी कर पाती हैं। जब तक ये एजेंसियां 5...

सरकारी ऑडिट: ज़मीनी हकीकत या महज़ एक 'फोटो-ऑप' और कागज़ी खानापूर्ति?

आज के दौर में विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटना एक आम बात हो चुकी है। सड़क निर्माण से लेकर सरकारी भवनों के जीर्णोद्धार तक, हर छोटे-बड़े काम के पूरे होने पर एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया जाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि इन कामों की गुणवत्ता और पारदर्शिता को परखने के लिए जो 'ऑडिट' (Audit) व्यवस्था बनाई गई थी, आज उसकी खुद की क्या साख बची है? ​आज की कड़वी सच्चाई यह है कि सरकारी कामों का ऑडिट महज़ एक औपचारिकता (Formality) और 'फोटो खिंचवाने' (Photo Opportunity) का जरिया बनकर रह गया है। ज़मीन पर काम की गुणवत्ता भगवान भरोसे होती है, जबकि कागज़ों पर उसे 'सौ फीसदी परफेक्ट' साबित कर दिया जाता है। ​1. 'फाइल और फोटो' संस्कृति: जहां कागज़ चमकते हैं, काम नहीं ​आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में 'ऑडिट' का मतलब अब गहराई से जांच करना नहीं, बल्कि फाइलें दुरुस्त करना हो गया है। जब भी कोई ऑडिट टीम आती है, तो पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि: ​ दस्तावेज़ों की खानापूर्ति: वाउचर, रसीदें और रजिस्टर मेंटेन हैं या नहीं। अगर कागज़ी आंकड़े आपस में मेल ...

​🛑 बेइज्जती सब: जब जनप्रतिनिधि भूल जाते हैं शिष्टाचार और मर्यादा

​🛑 बेइज्जती सब: जब जनप्रतिनिधि भूल जाते हैं शिष्टाचार और मर्यादा ​लोकतंत्र में जनता अपना प्रतिनिधि इसलिए चुनती है ताकि वह उनकी समस्याओं को सुने, उनकी आवाज़ बने और समाज में एक आदर्श स्थापित करे। लेकिन आज के दौर में एक विचलित करने वाली प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। जब कोई विधायक, सांसद या बड़ा नेता किसी आम नागरिक, सरकारी कर्मचारी या जूनियर को फोन करता है, तो बातचीत की शुरुआत शिष्टाचार से नहीं, बल्कि अहंकार से होती है। ​"मैं यह हूँ...", "मैं वह हूँ...", "तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ..."—जैसे वाक्य और 'अबे-तबे' जैसी भाषा शैली किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। यह सब और कुछ नहीं, बल्कि पद के अहंकार में की जाने वाली 'बेइज्जती' है। ​📱 फोन पर पावर का प्रदर्शन: अहंकार बनाम शिष्टाचार ​जब एक रसूखदार व्यक्ति किसी को कॉल करता है, तो बातचीत का स्तर उनके संस्कारों और उनकी राजनीतिक मैच्योरिटी को दर्शाता है। आइए देखते हैं कि एक 'अहंकारी नेता' और एक 'सभ्य जनप्रतिनिधि' की बातचीत में क्या अंतर होता है: ​❌ अहंकार और बेइज्जती वा...